Fund-of-Funds, LRS और GIFT IFSC — लागत, टैक्स और काग़ज़ी कार्रवाई की तुलना
इस लेसन में विदेश तक जाने वाले तीन रास्तों की तुलना है: भारतीय fund-of-funds, Liberalised Remittance Scheme के तहत सीधा निवेश, और GIFT IFSC के प्रोडक्ट। तुलना इन बातों पर है: मालिकाना हक, लागत, टैक्स, काग़ज़ी कार्रवाई, लिमिट और US estate tax का जोखिम।
निवेशक किस चीज़ का मालिक होता है
भारतीय fund-of-funds (FoF) में निवेशक एक भारतीय mutual fund स्कीम की यूनिट का मालिक होता है, जो रुपये में खरीदी जाती हैं, बिना किसी remittance के। सीधे रास्ते में निवेशक Liberalised Remittance Scheme (LRS) के तहत पैसा भेजता है और विदेशी securities का सीधा मालिक बनता है। GIFT IFSC के रास्ते में भी निवेशक LRS के तहत पैसा भेजता है और विदेशी मुद्रा (foreign currency) में एक प्रोडक्ट रखता है।
लागत
FoF का निवेशक खर्चों की दो परतें उठाता है: FoF के अपने खर्चे और उस फंड के खर्चे जिसमें वह निवेश करता है। Remittance वाले दोनों रास्तों में बैंक से remittance होता है, और सालाना सीमा से ऊपर tax collected at source (TCS) लगता है। TCS income tax में से घट जाता है (credit मिलता है) या refund हो जाता है, इसलिए इसमें नकद पैसा कुछ समय के लिए फँसता है, लेकिन यह कोई आखिरी लागत नहीं है। बाकी चार्ज इस पर निर्भर करते हैं कि कौन सा बैंक और कौन सा intermediary इस्तेमाल हुआ।
टैक्स (अक्टूबर 2026 की दरें)
जैसा आम तौर पर समझा जाता है, international equity FoF की यूनिट 24 महीने से ज़्यादा रखने पर long-term होती हैं, और gains पर बिना indexation के 12.5% टैक्स लगता है; नहीं तो gains पर slab rates से टैक्स लगता है। सीधे रखे गए विदेशी शेयरों के बारे में भी आम तौर पर यही समझा जाता है कि उन पर यही तरीका चलता है; उनके dividend पर slab rates से टैक्स लगता है, और विदेश में चुकाए टैक्स का credit tax treaty के तहत मिलता है।
GIFT IFSC के प्रोडक्ट से हुई कमाई और gains पर भारत में टैक्स लगता है, निवासियों (residents) के सामान्य नियमों के तहत।
काग़ज़ी कार्रवाई और लिमिट
FoF के रास्ते में एक सामान्य mutual fund folio इस्तेमाल होता है। इसकी बंदिश है mutual funds के विदेशी निवेश पर SEBI की लिमिट, जिससे नए निवेश (fresh subscriptions) रुक सकते हैं।
सीधे रास्ते के लिए PAN और बैंक से remittance चाहिए, हर financial year में USD 250,000 के अंदर (अक्टूबर 2026 की स्थिति), और विदेशी securities income-tax return के Schedule FA में बताई जाती हैं। GIFT IFSC के रास्ते में भी पैसा LRS के तहत जाता है, इसलिए वही लिमिट और वही TCS लागू होते हैं।
US estate tax
US-incorporated कंपनियों के शेयर US-situated assets हैं। जो व्यक्ति न US citizen है और न US resident, उस पर ऐसे assets के लिए US estate tax लग सकता है, सिर्फ़ USD 60,000 की छूट से ऊपर, और भारत की US के साथ कोई estate-tax treaty नहीं है। यह बात सीधे रास्ते में मायने रखती है। विदेश में निवेश करने वाले भारतीय mutual fund की यूनिट, और non-US कंपनियों के शेयर, निवेशक के US-situated assets नहीं हैं।
नियम एक नज़र में
वही US शेयर, दो तरीकों से रखे गए
ईशान एक निवासी भारतीय हैं जो US citizen नहीं हैं। उनके अपने नाम पर US-incorporated कंपनियों के USD 90,000 के शेयर हैं (यह रकम मानी हुई है)। ये US-situated assets हैं, और इनकी कीमत छूट से 90,000 − 60,000 = USD 30,000 ऊपर है, इसलिए इन पर US estate tax लग सकता है।
दिव्या के पास एक भारतीय fund-of-funds की यूनिट हैं जो US शेयरों में निवेश करता है। उनकी यूनिट एक भारतीय स्कीम की यूनिट हैं; ये उनके US-situated assets नहीं हैं, इनकी कीमत चाहे जितनी हो।
₹15 लाख पर दो रास्तों से जेब से जाने वाला पैसा
- एक निवासी (resident) के पास एक financial year में विदेशी शेयरों में लगाने के लिए ₹15,00,000 हैं, और उसने LRS के तहत कोई और remittance नहीं किया है। TCS की दरें अक्टूबर 2026 की हैं।
- भारतीय fund-of-funds के ज़रिए: कोई remittance नहीं होता, इसलिए LRS पर कोई TCS नहीं बनता। जेब से गया पैसा: ₹15,00,000।
- सीधे LRS remittance के ज़रिए: TCS है 20% × (15,00,000 − 10,00,000) = 20% × 5,00,000 = ₹1,00,000। Remittance के समय जेब से गया पैसा: ₹15,00,000 + ₹1,00,000 = ₹16,00,000, बैंक के चार्ज से पहले।
नतीजा। सीधे रास्ते में शुरू में ₹1,00,000 ज़्यादा नकद चाहिए, जो बाद में पैसा भेजने वाले के income tax में से घट जाता है (credit मिलता है) या refund हो जाता है। Fund-of-funds के रास्ते में कोई TCS नहीं है, लेकिन उसमें फंड के खर्चों की दो परतें हैं।
मुख्य बातें
- भारतीय fund-of-funds: रुपये में निवेश, कोई remittance नहीं, खर्चों की दो परतें; यूनिट एक भारतीय स्कीम की होती हैं, और SEBI की विदेशी लिमिट नए निवेश रोक सकती हैं।
- सीधा LRS रास्ता: PAN ज़रूरी, सालाना सीमा से ऊपर TCS; निवेशक विदेशी securities का सीधा मालिक होता है और उन्हें tax return में बताता है।
- GIFT IFSC का रास्ता: पैसा LRS के तहत जाता है, इसलिए वही लिमिट और TCS लागू होते हैं; होल्डिंग विदेशी मुद्रा में होती है।
- US-incorporated कंपनियों के शेयर US estate tax के लिए US-situated assets हैं; भारतीय mutual fund की यूनिट नहीं हैं।
आम ग़लतफ़हमियाँ
- GIFT IFSC का रास्ता LRS के बाहर नहीं है। वही सालाना लिमिट और वही TCS लागू होते हैं।
- 2026 के लिए USD 15 million की US estate tax छूट ऐसे निवासी भारतीय को नहीं मिलती जो US citizen नहीं है। उस व्यक्ति की US-situated assets पर छूट USD 60,000 है।
- ऐसा नहीं है कि fund-of-funds में कोई बंदिश नहीं। इसमें खर्चों की दो परतें हैं, और SEBI की लिमिट नए निवेश रोक सकती हैं।
लोग अक्सर पूछते हैं
किस रास्ते में निवेशक विदेशी securities का सीधा मालिक होता है?
सीधे LRS रास्ते में। Fund-of-funds का निवेशक एक भारतीय स्कीम की यूनिट का मालिक होता है।
क्या US शेयरों में निवेश करने वाले भारतीय mutual fund की यूनिट US-situated assets हैं?
नहीं। सीधे रखे गए US-incorporated कंपनियों के शेयर US-situated assets हैं; भारतीय स्कीम की यूनिट नहीं हैं।
क्या LRS के तहत remittance के लिए PAN चाहिए?
हाँ, सीधे रास्ते और GIFT IFSC के रास्ते, दोनों में।
यह लेसन किन स्रोतों पर आधारित है
- RBI — Liberalised Remittance Scheme (RBI FAQ on LRS)
- SEBI Master Circular for Mutual Funds, 20 मार्च 2026 (विदेशी निवेश की लिमिट)
- Income-tax Act, 2025 — capital gains और LRS remittance पर tax collected at source (अक्टूबर 2026 की दरें)
- US Internal Revenue Service — ऐसे non-residents के लिए estate tax जो US citizen नहीं हैं
इस लेसन के अंग्रेज़ी मूल को इन स्रोतों से मिलाकर स्वतंत्र रूप से जाँचा गया है (8 अक्टूबर 2026)। यह उसी का हिन्दी अनुवाद है, जिसे अंग्रेज़ी से मिलाकर अलग से जाँचा गया है। नियम बदलते रहते हैं: किसी भी आँकड़े पर भरोसा करने से पहले मौजूदा regulation, scheme document या policy wording देख लें। यह सिर्फ़ शिक्षा है, सलाह नहीं।

